आज और कल

वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब (जरूरतमंद और खुशहाल परिवार के बुजुर्गों का मंच)। बुढ़ापा एक जिन्दगी की कड़वी सच्चाई है जो सबकी उम्र में आनी है। कइयों के आ चुकी है या आने वाली है। पिछले कुछ वर्षों में मैंने और मेरी टीम यानी हम सबने मिलकर बुढ़ापे जैसे मुद्दे को सार्थकता प्रदान की है। एक नई दिशा और एक नया प्रयत्न किया है। बुजुर्गों को उनके घरों के साथ जोडऩे का, आदर-सम्मान के साथ जीने का और उनमें आत्मविश्वास भरने का कि आप किसी से कम नहीं। आप अनुभवों के खजाने हो।

आपने सारी उम्र बच्चों के लिए और समाज के लिए काम किया। अब आपकी अपनी बारी है अपने लिए जीने की। जीवन के हर पल को जीने की, मर्यादा में रहकर इंज्वाय करने की और समाज के मार्गदर्शक बनने की, क्योंकि आप किसी से कम नहीं हो। आपके चेहरे की झुर्रियां आपके अनुभव हैं। आपके आशीर्वाद के लिए उठे हाथ नियामत हैं जो कयामत तक काम आएंगे। इन्हीं के अनुभव से मैंने आशीर्वाद, ब्लैसिंग, जीवन संध्या, जिन्दगी का सफर किताबें लिखी हैं, परन्तु यह सब कुछ करते हुए इतने सालों में यही जाना कि जब तक यूथ में अच्छे विचार और संस्कार नहीं होंगे तब तक बुढ़ापे जैसी समस्या को सार्थकता प्रदान नहीं हो सकती।

हमारा देश भगवान श्रीराम का देश है। श्रवण कुमार का देश है। हमारे देश में वृद्ध आश्रम तो बिल्कुल नहीं होने चाहिएं। घर में मां-बाप, बुजुर्गों का सम्मान होना चाहिए और बच्चों को यह अहसास होना चाहिए कि वे मां-बाप के साथ रह रहे हैं न कि मां-बाप उनके साथ। और जहां वह आज हैं वहां कल उनके माता-पिता थे और जहां आज उनके माता-पिता हैं वहां वह कल होंगे। इस तरह आज और कल को समझने की हर युवक-युवती को बÞत जरूरत है और हरेक के दिमाग में यह भी होना चाहिए कि जो आज आप बोओगे वह कल आप काटोगे यानी इतिहास अपने आपको हमेशा दोहराता है।

हिन्दुस्तान के हर यूथ का एक ही धर्म है मानवता (वह हिन्दू-सिख-मुस्लिम-ईसाई बाद में है। पहले हिन्दुस्तानी है और उनका धर्म मानवता है)। सबका परम कत्र्तव्य देश प्रेम है। उनके अंदर भारतीय परम्पराएं और संस्कार होने चाहिएं और सबसे बड़ा संस्कार माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा करना और उनकी आज्ञा का पालन करना तथा उनकी जिन्दगी का उद्देश्य व लक्ष्य यही हो कि माडर्न होने के साथ-साथ अपने संस्कारों और परम्पराओं को कायम रखें, क्योंकि मेरी नजर में समय के साथ माडर्न होना, नई-नई तकनीक सीखना बुरी बात नहीं है।

मेरी नजर में लड़कियों के पहनावे में सलवार-कमीज, साड़ी भारतीय परम्परा का प्रतीक है, परन्तु अगर कभी-कभी जींस-टाप और स्कर्ट भी पहनी जाए तो कोई बुराई नहीं। हां, शरीर मर्यादा के अनुसार ढका जरूर होना चाहिए। नग्नता का होना माडर्न होना नहीं कहलाता है। मैं भी माडर्न और संस्कारी। हर तरह के कपड़े, ड्रैसिस पहनती , फैशन भी करती , परन्तु मर्यादा में रहकर। यानी वस्त्र कोई भी पहनो, हिन्दुस्तानी या विदेशी, नग्नता नहीं होनी चाहिए। ऐसे ही लड़कों के लिए कुर्ता-पाजामा या पैंट-कमीज या जींस शर्ट बÞत अच्छी है।

मेरे हिसाब से माडर्न होने, फैशन करने, तरह-तरह के कपड़े पहनने, सोसाइटी में अच्छे ढंग से व्यवहार करने, पार्टियों में जाने, सम्मान के साथ रहने में कोई बुराई नहीं। यह आज के समय की मांग है। बस इसमें मां-बाप की सहमति हो और हर माता-पिता को मालूम हो कि उसका बच्चा कहां जा रहा है? क्या कर रहा है? थोड़ा सा माता-पिता को भी अपने बच्चों को उनके तरीके से जीने का मौका देना चाहिए।

डर और प्यार यानी सख्ती और प्यार का मिश्रण रहना चाहिए और उनको इतना हौसला देना चाहिए कि अगर उनसे कोई गलती हो जाए तो सबसे पहले मां-बाप को बताएं, क्योंकि बच्चों से अक्सर गलतियां होती हैं और गलतियां करके ही सीखते हैं। ऐसा भी डर नहीं होना चाहिए कि वे एक गलती को छुपाने के लिए आगे गलत कदम उठाएं। कई बार बच्चे कम नम्बर आने पर मां-बाप के डर से या प्रेम जाल में फंसकर आत्महत्या करने की सोच लेते हैं। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए चोरी वगैरहा करना शुरू कर देते हैं। मेरा यह मानना है कि यदि समाज और देश में कुछ बदलाव आएंगे तो नई पीढ़ी ही लाएगी। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि नई पीढ़ी अपनी हर उपलब्धि के लिए पुरानी पीढ़ी की उपलब्धियों के प्रति भी शुक्रगुजार रहे।