अपनी बात

वरिष्ठ नागरिकों के लिए कार्य करते हुए लगभग 14 वर्ष हो गए और इस क्लब को रजिस्टर्ड करवाए 10 साल हो गए। यह कार्य एक नई पहल, नया प्रयास और अपने आप में एक चुनौती है। इसे करने के लिए बात धैर्य, सहनशीलता तथा टीम वर्क चाहिए। इसलिए जब इसे शुरू किया तो बात से लोगों और सहेलियों ने कहा कि यह कार्य कठिन है। बच्चों के लिए काम करो, उन्हें बढ़ते देख खुशियां मिलेंगी या लड़कियों के लिए काम करो पुण्य मिलेगा।

उनका कहना गलत नहीं था क्योंकि यह कार्य वाकई कठिन और चैलेंजिंग है। उन लोगों में खुशियां लाने की कोशिश करना जो जीवन के अंतिम समय में है और जिनमें जीने की चाहत खत्म हो रही है। उनमें आत्मविश्वास लाना कि ‘आप जिन्दगी के हर पल को जियो, आप किसी से कम नहीं हैं, मर्यादा में रहकर जिन्दगी को इंज्वाय करो। बड़ा कठिन कार्य है क्योंकि आप इनसे इनमें रहकर प्यार और मोह के बंधन में बंध जाते हैं। जब किसी सदस्य का मरणोपरांत सदस्यता कार्ड वापस आता है तो खाना खाने को भी मन नहीं करता।

आज इसको मैं सफल प्रयास मानती है जब उनके मुस्कराते चेहरे, उन्हें हंसते, गाते-नाचते देखती है तो मुझे लगता है ईश्वर ने मुझे बात बड़ा अवार्ड दे दिया है। इन्हीं के अनुभवों से मैंने पहली पुस्तक ‘आशीर्वाद’ लिखी जिसका अंग्रेजी अनुवाद ब्लेसिंग है। फिर ‘जीवन संध्या’ लिखी जिसमें बुजुर्गों के अनुभव से जाना कि वह जीवन की संध्या में अब घर के रामू-बहादुर नहीं हैं। घर के किसी कोने में बैठकर माला फेरना ही उनका काम नहीं रह गया, बल्कि वह अपने में नया जोश भरें।

वह मर्यादा में रहकर अपनी जिन्दगी की हर इच्छा पूरी कर सकते हैं। फिर ‘जिन्दगी का सफर’ लिखी, जिसमें समाज को जागृत करते है एक अनुभव बांटे कि बात से कानून बनते रहते हैं, जिनके तहत बच्चों को मां-बाप की देखभाल करने से मुंह मोडऩे आदि के कारण जेल अथवा जुर्माना हो सकता है। अभिभावक मोह-मायावश बच्चों के नाम की गई जमीन-जायदाद वापस भी ले सकते हैं। मेरे विचार में इन कानूनों का तब तक फायदा नहीं होगा जब तक हममें और आने वाली पीढिय़ों में अच्छे संस्कार, भावनाएं, विचार शक्ति का विकास नहीं होगा। हमारी भारतीय संस्कृति, परम्पराएं दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।

जरूरत है तो केवल उन्हें जीवित रखने की, इस धरोहर को आने वाली पीढिय़ों को सौंपने की। यह मेरा निजी अनुभव है क्योंकि मुझे संस्कार दिए मेरी जननी ने और जिन्दगी में व्यवहार करना सिखाया सासु मां ने। यह पुस्तक ‘आज और कल’ आने वाली पीढ़ी और अनुभवी पीढ़ी को समर्पित है। युवाओं को जागृत करने के लिए जहां तुम आज हो वहां कल तुम्हारे बुजुर्ग थे। जहां आज तुम्हारे बुजुर्ग हैं वहां तुम कल होंगे। यानी आज और कल का सिलसिला सदियों से चलता आया है और चलता रहेगा। जो बोओगे वो काटोगो, इतिहास हमेशा दोहराता है। सो कोई भी अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी के प्रति गलत कदम उठाने या सोचने से पहले हजार बार सोचें कि जो आज तुम उनके लिए करोगे, कल वैसे ही तुम्हारे बच्चे तुम्हारे लिए करेंगे, यही जिन्दगी की सच्चाई है।

भले आप हर बार हर उपकार को भूल जाना परन्तु मां-बाप को नहीं भूलना। खूब लाड़-प्यार किया तुमसे, तुम्हारी हर जिद पूरी की। ऐसे प्यार करने वालों से प्यार करना कभी न भूलना। चाहे लाखों कमाओ लेकिन मां-बाप खुश नहीं तो लाख भी खाक हैं। जिन्होंने तुम्हारी राहों पर फूल बिछाए उनकी राहों में कांटे मत बिछाना, क्योंकि दौलत से तुम्हें हर चीज मिलेगी, लेकिन मां-बाप कभी नहीं मिलते। जैसा करोगे वैसा भरोगे। कभी न भूलना घर की मां को रुला कर मंदिर की मां को पूजोगे तो कोई फायदा नहीं।

जिस मां-बाप ने अंगुली पकड़ कर तुम्हें चलना सिखाया, सदा उनके साथ चलना, जिन्होंने तुम्हें बोलना सिखाया उन्हें बड़े होकर मौन रहने के लिए न कहना। जिस दिन तुम्हारे कारण तुम्हारे मां-बाप की आंखों में आंसू आए समझना तुम्हारा जीवन जीने का अर्थ उन आंसुओं में बह गया। जब तुमने पहला श्वांस लिया तब मां तुम्हारे पास थी। जब तुम्हारी मां अंतिम श्वांस ले तो उसके पास रहना, जिन मां-बाप, दादा-दादी ने तुम्हारे जन्म पर लड्डू बांटे। कल तुम उन्हें न बांटना, उन्हें सेवा, प्यार, सम्मान के रूप में लड्डू खिलाना।

‘आज और कल’ दोनों पीढिय़ों को जिन्दगी की सच्चाई से अनुभवों के साथ अवगत कराने का जरिया है। बुजुर्गों को भी तीन बातें हमेशा याद रखनी हैं कि बच्चों,  बेटे, बेटियों की प्रशंसा करें। जब उनसे सलाह मांगी जाए तभी दें। ज्यादा हस्तक्षेप- कब, क्यों, कहां- न करें। यानी नौन, मौन, कौन का सिद्धांत अपनाएं। बुजुर्ग अपने आप को व्यस्त और मस्त रखें।