देश का युवा राष्ट्र, शक्ति

देश का युवा राष्ट्र की शक्ति होता है। अगर इसकी ऊर्जा का सदुपयोग हो तो राष्ट्र उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकता है, लेकिन दुर्भाग्यवश आज का युवा पथभ्रष्ट होता जा रहा है। सवाल यह उठता है कि देश का युवा दिशाहीन क्यों रहा है। उसके जीवन में भटकाव क्यों हैं। इस दिशाहीनता के पीछे कई कारण हैं। पहला तो यह कि हम पाचात्य संस्कृति को आत्मसात करने के पीछे भा रहे हैं। भारतीय संस्कृति और सभ्यता से वर्तमान पीढ़ी कोसों दूर हो चुकी है।

पिछले कुछ दशकों से नैतिक मूल्यों का लगातार ह्रास हुआ है। युवा पीढ़ी को न तो अभिभावक अच्छे संस्कार दे रहे हैं और न ही उनमें नेतृत्व के गुण पैदा किए जा रहे हैं। सामाजिक विषमताओं के बीच घर टूट रहे हैं। पारिवारिक रिश्ते खंडित हो रहे हैं और जो माता-पिता दोनों ही नौकरी करते हैं वे अपने बच्चों को पूरा समय नहीं दे पाते। सामाजिक रिश्तों में दूरियां भी बच्चों को दिशाहीन बना देती हैं। टीवी और इंटरनेट की दुनिया में वर्तमान युवा पीढ़ी अपने लिए केवल आनंद ढूंढती है और वह विवेक से काम नहीं लेती। यही कारण है कि हमारा युवा गलत रास्तों पर चलकर अपनी ऊर्जा को बर्बाद कर रहा है।

आजकल इस तरक की खबरें आ रही हैं कि पंजाब के 70 प्रतिशत से अधिक युवा नशों के शिकार हैं। ऐसे इसलिए हैं कि हमने शिक्षित लोगों की एक बड़ी फौज तो तैयार कर दी लेकिन रोजगार देने के हम साधन विकसित नहीं कर पाए। बेरोजगार युवा गलत संगत में फंसकर नशों का शिकार हो रहे हैं और तीसरी बात यह है कि आज के युग में पैसों की अंधी दौड़, चकाचौंध दुनिया में अमीर बनने के लिए शाटकट रास्ते युवा को भटका रहे हैं। रात ही रात में अमीर बनने की चाहत में आज का युवा नियम कायदे और मर्यादाओं को ताक पर रख रहा है।

आधे भरे गिलास को देखकर एक युवा कहता है कि गिलास आधा भरा है और दूसरा युवा यह कहता है कि गिलास आधा खाली है। यह सोच का फर्क है। एक युवा की सोच सकारात्मक है जबकि दूसरी की सोच नकारात्मक। जब पढ़-लिखकर युवाओं को रोजगार नहीं मिलता और अगर मिलता भी है तो योग्यतानुसार उचित पारिश्रिमिक नहीं मिलता तो वह निराशा में जीता है और निराशा उसे अंधे कुएं में धकेल देती है।
आज का युवा विवेकानंद की बजाए मैडोना, इमरान हाशमी जैसे लोगों को अपना आदर्श मानता है।

उसकी दिलचस्पी विवेकानंद के आदर्शों की अपेक्षा अश्लीलता को बढ़ावा देने वाले तथाकथित युवा आदर्शों में है। आज का भौतिकवाद और कृत्रिमता के भंवर में युवा ऐसा फंसा है कि फंसता ही जा रहा है। युवाओं को सही भौतिक रोजगारपरक शिक्षा मिले, ताकि उन्हें रोजगार मिलने में सहूलियत हो। हमारे शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। युवाओं में सकारात्मक सोच पनपे इसके लिए हमारे अभिभावकों को बड़े इत्मीनान से युवाओं को प्रोत्साहन व मार्गदर्शन करना चाहिए।

याद रखें कि युवा शक्ति एक ऐसी अग्नि है जिसे नियंत्रित करने के लिए जल की तरह शांत और ठंडे दिमाग से ही सम्भाला जा सकता है।
जरूरत इस बात की है मां-बाप बच्चों को संस्कारवान बनाने का दायित्व निभाएं ताकि बच्चों की ग्रोथ एक सकारात्मक वातावरण में हो। अगर वह अपना दायित्व निभाने में नाकाम रहें तो बच्चों की जिंदगी में भटकाव आना स्वाभाविक है। आज राष्टï्र को विवेकानंद जैसे युवाओं की तलाश है।