कल, आज और कल

नए, पुराने की बात जब भी चलती है तो थोड़ी हंसी भी आती है, आश्चर्य भी होता है कि हम लोग इस हकीकत को आत्मसात क्यों नहीं कर पाते कि आज जो युवा है वही आने वाले कल का बुजुर्ग है। आज जो बुजुर्ग है वही बीते हुए कल का युवा था। इस सीधी सी हकीकत को न समझने के कारण पीढिय़ों के बीच टकराव की नौबत आने लगती है। ढेरों मिसालें हैं पीढिय़ों के बीच सम्मान के रिश्ते की। नरेंद्र (बाद में स्वामी विवेकानंद) और स्वामी रामकृष्ण परमहंस के बीच पीढिय़ों की दूरी के बावजूद एक पारस्परिक वैचारिक संबंध था। शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने यदि सांडर्स पर गोलियां बरसाई थीं तो अपने एक बुजुर्ग नेता लाला लाजपत राय पर हुए नृशंस लाठीचार्ज के खिलाफ अपना आक्रोश दर्ज कराने के लिए।

गांधी और नेहरू के बीच भी एक वैचारिक रिश्ता था। आज जिस पंजाब केसरी से लाखों-करोड़ों युवा पाठक जुड़े हैं, वे सब वयोवृद्घ क्रांतिकारी विचारक एवं आतंकवाद को खुली चुनौती देने वाले हमारे महान बुजुर्ग लाला जगत नारायण जी की देन हैं। पीढिय़ों के बीच एक वैचारिक सांझेदारी जरूरी है। नए व पुराने के बीच वही अंतर है जो कल (अतीत), आज और कल (भविष्य) के बीच है। वर्तमान की कल्पना बीते हुए कल के बिना हो ही नहीं सकती। लाला जी, पूज्या दादी जी व श्रद्घेय रमेश जी की याद आती है तो जिंदगी में स्नेह, प्यार, श्रद्घा और सद्भाव के असंख्य झरने फूटने लगते हैं। ढेरों ऐसे प्रसंग हैं इन सबकी जिंदगी से जुड़े, जो आज भी मुझे हर संकट की घड़ी में संघर्ष की प्रेरणा देते हैं।
मुझे अपनी नानी भी कभी-कभी बहुत याद आती है।

हम लोग जब भी गर्मी की छुट्टिïयों में ननिहाल जाते, नानी सबको अपने सामने बैठा लेतीं, फिर सबकी अलग-अलग थाली सजातीं और उनमें सारे पकवान, सब्जियां, फल बराबर-बराबर सजाकर रख देतीं। एक वाक्य वह अक्सर बोलतीं कि कुछ कम हो तो भी ‘जरा-जराÓ बांट लो तो पूरा-पूरा स्वाद व सुख भीतर तक घर कर जाता है। यही संस्कार मां के थे। मां बीमार होती तो भी सबके लिए उनकी अलग-अलग रुचि के अनुसार खाना बनातीं। स्वयं न भी खा पातीं तो भी उनके चेहरे पर सुकून होता कि घर का हर सदस्य पेट भर खा चुका है। वैसे मेरा मानना है कि हर दादी, नानी, मां एक जैसी होती हैं। उन्हें सिर्फ थोड़ा स्नेह, सम्मान चाहिए। यह स्थिति दूसरी ओर भी जरूरी है। मैं अब सास हंू। मैं अपने बेटों व पुत्रवधू की भावनाओं व जरूरतों का ख्याल रखंू, यह मेरा फर्ज भी है और मेरी जिम्मेदारी भी। यदि मुझे सुख चाहिए तो आज एक सुख का पौधा अपनी नई पीढ़ी के आंगन में भी लगाना होगा।

हमारे मध्यम वर्ग में बहुत से परिवार हैं, जिनके युवा बेटे-बेटियां आईटी क्षेत्र में या मैनेजमेंट के क्षेत्र में काम करने जाते हैं। हम कई बार पूरा-पूरा अंदाजा ही नहीं लगा पाते कि उन युवाओं को कितने दबाव में काम करना होता है। कंपनियां मुनाफे से सरोकार रखती हैं। हर युवा कर्मी के सामने टारगेट अर्थात लक्ष्य रखा जाता है। अब नौकरी न तो सुबह 10 बजे से सायं 5 बजे का खेल है और न ही कर्मचारियों को अतीत में मिलने वाली सुविधाओं का। अब तो सरकारी बैंकों में काम करने वाले युवाओं को भी कम से कम 12 घंटे काम करना ही होता है। अब युवाओं पर जो कई-कई बार रात-रात भर कंप्यूटरों से मगजपच्ची करते हैं, हम अपनी परंपराओं, संस्कारों या रीति-रिवाजों का ज्यादा बोझ लादेंगे तो उन पर दबाव और भी बढ़ेगा। संस्कार, परंपराएं, सहज भाव से भी हर नई जिंदगी का हिस्सा होती हैं।

उन्हें लादने की कोशिश में हम नई पीढ़ी के साथ अपने रिश्तों की मिठास को कई बार खटास में बदल देते हैं। हमें इन सब दबावों से परहेज करना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपनी कारोबारी चुनौतियों का पूरी शक्ति के साथ सामना कर सके। अभी उत्तराखंड की त्रासदी हम सबने देखी। वहां युवा पत्रकारों, युवा सैनिकों और अनेक एनजीओ के युवा कार्यकर्ताओं की कर्मठता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपनी पीठ पर बुजुर्गों को लादकर या अपनी गोद में उठाकर राहत शिविरों तक इन युवाओं ने पहुंचाया। युवा पत्रकारों ने दुखी परिवारों के साथ रहकर उनकी सही स्थिति पूरी दुनिया के सामने उजागर की। यदि सरकारें जागीं और मदद के सिलसिले शुरू हुए तो इन्हीं युवाओं की साहसी पत्रकारिता के कारण। मेरा मूल बिंदू यही है कि निर्माण और विकास में दोनों पीढिय़ों की महत्वपूर्ण भूमिका है और हमें इस संवेदनशील तथ्य का मर्म अपने भीतर तक उड़ेलना होगा।

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